लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा छठी पोस्ट
क्यों सरकार द्वारा नवीन चावला के बारे में मुख्य चुनाव आयुक्त
की सिफारिश को स्वीकार किया जाना चाहिए
चुनाव आयुक्त श्री नवीन चावला के सम्बन्ध में उठे वर्तमान विवाद से मुझे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार के शासनकाल में बेनजीर भुट्टो से उनकी दिल्ली यात्रा के दौरान हुई बातचीत का स्मरण हो आया है। उस दिन उन्होंने मेरे साथ लंच किया था और वे सिन्धी कड़ी के एक स्वादिष्ट व्यंजन जिसे मेरी पत्नी कमला बहुत अच्छे ढंग से बनाती है, पर मुझसे बात कर रही थीं।
लंच करने के बाद हुई हमारी गपशप के दौरान मैंने बेनजीर से एक प्रश्न किया ”यह कैसे है,” कि ”यद्यपि भारत और पाकिस्तान दोनों के राजनीतिक नेतृत्व ने अंग्रेजी शासनकाल में एक ही तरह की राजनीतिक संस्कृति आत्मसात् की थी लेकिन भारत ने उल्लेखनीय सफलता के साथ अपने लोकतंत्र को संभाला है परन्तु पाकिस्तान में लोकतंत्र पूरी तरह से विफल रहा है।” बेनजीर भुट्टो का उत्तर संक्षिप्त और सारगर्भित था : ”मैं आपके देश की सफलता के लिए दो बातों को श्रेय देती हूं। पहली, आपकी सशस्त्र सेना राजनीति से दूर है। दूसरी, आपका चुनाव आयोग संवैधानिक तौर पर कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त है।”
बेनजीर ने भारतीय लोकतंत्र की दो सुनिश्चितियों को सही पहचाना था। इनमें से पहली: भारतीय सेना ने कभी भी किसी तरह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं पाली। इसका श्रेय पूरी तरह से हमारी सशस्त्र सेनाओं और उन लोगों को जाता है जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद सेना को नेतृत्व प्रदान किया। जबकि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का श्रेय निश्चित रूप से संविधान सभा को दिया जाना चाहिए।
तथापि, अनुच्छेद 324 पर हुई संविधान सभा की बहस में प्रख्यात लोगों ने हिस्सा लिया था जो चुनाव आयोग को प्रदान की गई स्वतंत्रता से और भी ज्यादा आजादी देना चाहते थे। इन सदस्यों ने इस बात को अनुमोदित नहीं किया था कि चुनाव आयोग की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाएगी और यह कि आयोग को दी गई सुरक्षा चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए सीमित की गई थी। इस अवसर पर बोलते हुए पंडित हृदयनाथ कुंजरू ने कहा था :
”महोदय चुनाव सूचियां तैयार करने और चुनावों का आयोजन करने की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को सौंपी जानी चाहिए जो राजनीतिक पक्षपात से मुक्त हों और जिनकी निष्पक्षता पर सभी परिस्थितियों में भरोसा किया जा सके। हम इसके लिए चिन्तित हैं कि राष्ट्रपति के हाथों में बहुत-कुछ शक्ति सौंपकर हमने केन्द्र सरकार द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति में राजनीतिक प्रभाव पड़ने की काफी गुंजाइश छोड़ दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर होती है और यदि प्रधानमंत्री पार्टी के किसी व्यक्ति को नियुक्त करने की सलाह देते हैं तो राष्ट्रपति के पास सिवाय इसके कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा कि वह प्रधानमंत्री के नुमाइंदे को ही स्वीकार करे चाहे वह जनता की नजर में अनुपयुक्त ही क्यों न हो।”
वर्ष 2006 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त श्री बी.बी. टंडन ने राष्ट्रपति डा0 ए.पी.जे. कलाम को सम्बोधित एक बहुत ही तर्कसंगत पत्र में सरकार से यह निवेदन किया था कि जैसाकि केन्द्रीय सतर्कता आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मामले में होता है, नियुक्तियां कार्यपालिका द्वारा नहीं होनी चाहिए बल्कि ऐसी समितियों द्वारा की जानी चाहिए जिनमें लोकसभा अध्यक्ष तथा संसद में प्रतिपक्ष के नेताओं को भी शामिल किया जाए। चुनाव आयोग के मामले में भी इसी प्रकार की एक समिति को ऐसा करने हेतु प्राधिकृत किया जाना चाहिए। श्री टंडन ने डा0 कलाम को लिखे अपने पत्र को इस टिप्पणी के साथ समाप्त किया :
”यह नीति न केवल संविधान सभा में हुई बहसों की भावना/विचारों के अनुरूप होगी बल्कि इससे चुनाव आयोग के बारे में निरन्तर निष्पक्षता, तटस्थता और विश्वसनीयता में हमारे महान लोकतंत्र की जनता के विश्वास को और मजबूत करने में भी मदद मिलेगी।”
श्री नवीन चावला से सम्बन्धित ताजा विवाद के सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय से सम्बन्धित संविधान के अनुच्छेद 124 की तुलना चुनाव आयोग से सम्बन्धित प्रावधान वाले अनुच्छेद 124 से करना शिक्षाप्रद होगा। संविधान के अनुच्छेद 124 में यह प्रावधान है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा सर्वोच्च न्यायालय के किसी भी अन्य न्यायाधीश को संसद द्वारा निर्धारित महाभियोग की प्रक्रिया के सिवाय पद से नहीं हटाया जा सकता है। चुनाव आयुक्तों के मामले में संविधान में कहा गया है कि ”वे मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के सिवाए उनके पदों से नहीं हटाये जायेंगे।”
भारतीय जनता पार्टी की ओर से पार्टी के महासचिव श्री अरूण जेटली ने सही तर्क दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 324(3) के दूसरे परन्तुक में इस्तेमाल किए गये ”सिफारिश” शब्द को एक बाध्यकारी सिफारिश माना जाना चाहिए। श्री जेटली ने उच्च न्यायालयों के जजों की नियुक्ति से सम्बन्धित संविधान के अनुच्छेद 217 की ओर ध्यान आकृष्ट किया है जिसमें जज की नियुक्ति ”मुख्य न्यायाधीश के परामर्श” के बाद की जानी होती है। मुख्य न्यायाधीश के सुझाव को हमेशा बाध्यकारी माना गया है।
इसलिए पार्टी ऐसा महसूस करती है कि श्री नवीन चावला के सम्बन्ध में मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश को सरकार द्वारा अविलम्ब स्वीकार कर लिया जाना चाहिए।
If you enjoyed this post, make sure you subscribe to my RSS feed!

March 2nd, 2009 at 3:42 pm
माननीय आडवाणी जी,
आपसे मैं सौ प्रतिशत सहमत हूं। लेकिन मैं अपनी नादानी के चलते एक सवाल पूछने का मोह नहीं छोड़ पा रहा कि यदि आपके दल या गठबंधन की सरकार होती तो क्या वह श्री नवीन चावला के सुझाव को मानती?
March 4th, 2009 at 8:53 pm
L K Advani’s Blog Now In Hindi…
I was surprised to see FeedDemon showing Hindi text for L. K. Advani’s blog. I remembered that the blog was in English when I had first seen it and posted about it here.
It seems he has switched to Hindi. A bad choice to say the least. English is the …
March 6th, 2009 at 1:16 pm
She is an ideal for youngones.she give her full support to constitution.
March 6th, 2009 at 4:48 pm
I as the responsible citizen of Delhi would like to propose Aarti Mahra Ji , the mayor of Delhi for the forthcoming elections. I am of the opinion she is the most desirable candidate because of her involvement in the welfare of the youth. She will be the true torchbearer for the transformation of the nation.
March 6th, 2009 at 5:14 pm
Aarti Mehra, the name in itself is so complete. For the past few years she has played a vital role in make Delhi, what it is today. I would request top BJP brass to consider mam again for the effort she has put in the past.
March 8th, 2009 at 6:56 pm
Dear Advani ji ,
I wish to give a new slogan to the party for the next Elections
Mahngayi , Aantak aur Bhrastachar se Mukti ,
Paayen BHAJPA ko de kar shakti
Best regards ,
Rajiv Vashistha
March 12th, 2009 at 8:59 pm
Respected Advani ji..
I admire your interpretation and analysis but i think in todays world there remains nothing faithful, no one is trust worthee and that is the reason all this thing happening.
March 14th, 2009 at 5:45 pm
Respected Advani ji..
I admire your interpretation and analysis but i think in todays world there remains nothing faithful, no one is trust worthee and that is the reason all this thing happening.
Best Regard
Brajesh Kumar Tiwari
March 15th, 2009 at 9:36 pm
Respeted Advani ji,
If you like to win in Parliamentary Election in Delhi you have to distribute tickets to the people who are liked in their areas, not like Aarti Mehra, Mayor of Delhi, the leader of the most corrupted corporators in the history if MCD.
By the deeds of BJP corporators in Delhi, BJP is also going to loose Parliamentary Election just like Legislative Assembly in Delhi.
Rectification can be made if you can
March 25th, 2009 at 8:03 am
dear sir,
as u suggested the neutrality og election commision ,but is it possible when u”ll be as a P.M.,u”ll follow these norms?
if that then it ‘ll be fine
April 1st, 2009 at 12:06 am
प्रिय आडवानी जी,
मै आपकी बात से शतप्रतिशत सहमत हूँ , परंतु साथ ही यह भी सत्य है की कोइ भी राजनीतिज्ञ अपने धंधे के वक़्त किसी भी तरह का ज़ोखिम उठाना पसंद करेगा क्या? चुनाव 1 नागरीक की दृषटी मे सम्मानिय आवश्यक प्रक्रिया है, परंतु 1 राज्नीतिज्ञ के लिये स्विस खाते तीव्रता से भरने का उपाय है.
April 15th, 2009 at 9:08 am
hello, all bjp members
this is Yogesh Tyagi from Saharanpur and i am a BJP supporter i want to know who is the BJP condidate from Saharanpur because in this site there entry is no fill up. I m living in Noida so i wanna know please tell me any one ….sendme a mail at “tyagi.yogesh5@gmail.com”.
I know in this election BJP will be win, if our bjp “karyakarta” do your work sencerly then i m sure BJP will win ….and the next prime minister would be our LOH PURUSH m sure.
May 4th, 2009 at 12:31 pm
adwani ji ,instead of family background coloured in congess ,I,m willing to see u as prime minister,instead of someone else who lowered the value of this post. BEST OF LUCK………….
HUM BADLAV CAHTE HAIN