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वामपंथ का ढहता दुर्ग

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ममता बनर्जी ने इतिहास रच दिया है। कोलकाता के एक अग्रणी दैनिक ने उनकी विजय गाथा को मुख पृष्ठ पर इस शीर्षक से प्रकाशित किया है: ”कोलकाता की महारानी, अभी बंगाल की नहीं।” (Queen of Calcutta, Not of Bengal yet ).

वे संभवतया वह भी बन जाएं, उन्हें विधानसभाई चुनाव निश्चित समय से पहले कराने के मामले में धैर्य नहीं खोना चाहिए। धैर्य उनको अच्छे लाभ दे सकता है।

यदि कोलकाता का माक्र्सवादी दुर्ग ढहा है तो ममता उसमें सिर्फ निमित्त बनी है। वास्तव में उपलब्धि तो कम्युनिस्टों की स्वयं की है। ‘उपलब्धि’ नकारात्मक है: यानी लोगों से ‘कट जाना’, जैसाकि प्रकाश करात ने सही ही कहा है।

यदि अमेरिकी स्वयं प्रयास करते तो कभी भी सोवियत संघ के विशाल साम्राज्य को समाप्त करने के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकते थे। स्टालिनवादी ज्यादतियां, हंगरी और चेकोस्लोवाकिया जैसी कार्रवाई और - जैसाकि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन में ब्रिटिश अपने बारे में दंभ भरते थे, उनके साम्राज्य मे सुर्य कभी अस्त नहीं होता की तर्ज पर यह बढ़ता दंभ कि ” मार्क्सवादी साम्राज्य में भी सूर्य कभी अस्त नहीं होगा।”

ज्यादा भविष्यवक्ताओं ने कभी यह भविष्यवाणी नहीं की थी कि 1989 कितना क्रांतिकारी सिध्द होगा। यह वही वर्ष था जब बर्लिन दीवार ढही, सोवियत समाजवादी गणतंत्र संघ (यू.एस.एस.आर.) विघटित हुआ और शीतयुध्द नाटकीय ढंग से समाप्त हुआ।

1951 के पहले चुनाव में भारतीय राजनीति का एक सक्रिय भागीदार होने के नाते मैं अपने देश के संदर्भ में भी 1989 के महत्वपूर्ण वर्ष को नही भूल सकता । यह वर्ष राष्ट्रीय राजनीति में भी एक निर्णायक मोड़ के रुप में सिध्द हुआ ।

जो भाजपा 1984 में, पूरे देश में केवल दो लोकसभा सीटें जीत पाई उसने चमत्कारिक ढंग से उंची छंलाग लगाई और उसने लोकसभा की 86 सीटें जीती - सर्वाधिक न्यून स्तर से सर्वाधिक उच्च स्तर पर ।

और तब से पार्टी श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में मजबूती प्राप्त कर बढ़ती रही और 1996 में उसने काँग्रेस को पीछे छोड़ लोकसभा में सबसे बड़ा दल बनने में सफलता पाई। 1998 में यानी भारत द्वारा अपनी स्वतंत्रता की स्वर्ण जंयती मनाने के एक वर्ष बाद ही भाजपा ने नई दिल्ली में काँग्रेस को पदच्युत कर दिया और अगले 6 वर्ष तक इस विशाल देश पर सफलतापूर्वक शासन किया ।

मै मानता हँ कि 1989 के वर्ष में भाजपा को अपने जीवन की सर्वाधिक बड़ी उपलब्धि की नींव रखने का अवसर दिया - भारत की एकदलीय राजनीति के प्रभुत्व को द्विध्रुवीय राजनीति में बदलने का ।

कोई आश्चर्य नही कि 1989 के लोकसभा चुनावों ने जनता दल को गैर- काँग्रेस दलों में सर्वाधिक बड़ा दल बनाया और श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाया , लेकिन लंदन से प्रकाशित न्यू स्टेट्समैन ने भारतीय चुनावों पर अपने लेख को महत्वपूर्ण शीर्षक दिया : ”विजेता दूसरे स्थान पर”.

***

काँग्रेस के ह्यस की जडें आपातकाल में हैं। यदि आपातकाल नहीं होता तो 1977 भी नही होता !

जयप्रकाशजी, अटलजी और मोरारजी भाई तो निमित्त मात्र थे, जैसाकि पश्चिम बंगाल में ममता है।

1977 में आपातकाल के बावजूद कांग्रेस आंध्र में अच्छे ढंग से जीती । जनता पार्टी दयनीय रुप से एक मात्र सीट जीत पाई -और वह भी संजीव रेड्डी की ।

आंध्र को, राज्य में कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार तोड़ने के लिए एक और चुनाव तथा एन0टी रामाराव के आने की प्रतीक्षा करनी पड़ी।

एक पार्टी का प्रभुत्व लोकतंत्र का दुश्मन है। जब भारतीय लोकतंत्र का इतिहास लिखा जाएगा तब उन सभी का नाम सदैव स्मरण होगा जिन्होंने केन्द्र या राज्यों में एक पार्टी के अधिपत्य को समाप्त करने में अपना योगदान दिया। ऐसी सूची काफी लंबी है जिसमें न केवल डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी , डा0 लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय, जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राष्ट्रीय दिग्गज अपितु सी0एन0 अन्नादुरई, एम0 जी0 रामचंद्रन और एन0टी रामाराव जैसे नेता भी शामिल हैं। मै मानता हूं कि जो ममता बनर्जी ने भी किया है वह लोकतंत्र को मजबूत करने में एक महत्वपूर्ण योगदान है ।

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली

०५ जून, २०१०

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6 Responses to “वामपंथ का ढहता दुर्ग”

  1. सिरिल Says:

    1989 की उपलब्धी का श्रेय आपका भी है, यह बात अलग है कि आपने modesty के चलते अपने बारे में बात नहीं की. आपकी इस बात से सहमत हूं कि लोकतंत्र के लिये एक ही पार्टी का वर्चस्व ज़हर है, लेकिन यह नहीं मान पाता की छोटी पार्टियों के उदय से लोकतंत्र मजबूत हुआ है. मुझे तो लगता है कि क्षेत्रिय पार्टियों के आने के बाद जो बंडरबांट शुरु हुई उसकी वजह से बड़ी पार्टियां भी मजबूर हो गईं कि छोटे दलों की गलतियों और बेईमानियों को अनदेखा करें. वरना क्या वजह रही की शिबु सोरेन जैसे लोगों को भाजपा को सहयोग देना पड़ा?

  2. काजल कुमार Says:

    ममता देश की रेलमंत्री होने के बजाय एक राज्य की मुख्यमंत्री बनने से आगे नहीं सोच सकतीं. देवगौड़ा तो प्रधानमंत्री बन कर भी कर्नाटक से ऊपर नहीं उठ पाए.

    बिहार के रेलमंत्रियों की रेलें बिहार से ही बाहर नहीं निकलतीं. क्षेत्रियता इतनी हावी है कि पहाड़ी क्षेत्रों को देश की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए शायद तभी काम होगा जब कश्मीर, हिमाचल, उत्तरांखंड, सिक्किम, अरूणाचल, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम व त्रिपुरा के सांसद बारी-बारी से रेलमंत्री बनाए जाएंगे. दूसरी ओर, चीन ने बीजिंग से ल्हासा को जोड़ कर पूरे तिब्बत को मुख्यधारा में समाहित किया है.

    बीजेपी की दो नीतियों ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया था. NHAI के माध्यम से राष्ट्रीय राजमार्गों के क्षेत्र में क्रांति व दूसरे, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना. राष्ट्रीय नदियों को जोड़ने की दिशा में कोई विषेश प्रगति नहीं होने के कारण मैं इसे तीसरी प्रभावशाली योजना नहीं मान पाया.

    देश गठबंधन व्यवस्था के मुहाने पर खड़ा है. इसलिए यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि देश में स्थायी नीतियां अपनाई जाएं जो सरकारों के आने जाने से प्रभावित न हों.

  3. Ratan Singh Shekhawat Says:

    बचपन से सुनते आये है की पाप का घड़ा पूरा भरने के बाद ही टूटता है |शायद वामपंथियों के पाप का घड़ा बंगाल में भर चूका है और ममता के बहाने टूटने वाला है |

  4. varun jha Says:

    ममता बनर्जी ने इतिहास रच दिया है।

  5. JYOTI DHARMENDRA GUPTA BHIND Says:

    आप लगातार अपने अनुभव और मौलिक विचार सभी तक पहुंचा रहे हैं. यह आने वाले कल की अमूल्य धरोहर होंने वाली है. आपके अपने चमत्कार इतने हैं की जब भाई नरेन्द्र जी मोदी PM बनेंगे तब देश में दो ही नाम चलेंगे..अटल-अडवानी

  6. dhiru singh Says:

    बंगाल का लाल दुर्ग ढह गया कहना जलदी है शायद . कभी कभी खन्डहर भी भव्य होते है महलो से .

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