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विदेश में जमा गुप्त भारतीय धन पर श्वेत पत्र की जरुरत

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जब वर्ष 2008 में भारतीय जनता पार्टी ने सबसे पहले स्विस बैंकों और अन्य टैक्स हेवन्स में भारतीय धन के गुप्त रुप से जमा होने के मुद्दे को उठाया तो कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं ने इसका मजाक उड़ाया। वे सवाल करते थे कि जब एनडीए ६ वर्ष के लिए सत्ता में थी,तब इस मामले में क्यों कार्रवाई नहीं की गई। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने इसे चुनावी स्टंट कहा।

इसलिए, जब भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस मुद्दे का उल्लेख किया गया तो मुझे प्रसन्नता हुई। संसद की संयुक्त बैठक को सम्बोधित अभिभाषण में कहा गया कि: ”भारत कर सम्बन्धी सूचना के आदान -प्रदान को सुगम बनाने तथा कर चोरी की सुविधा देने वाले क्षेत्रों के खिलाफ कार्रवाई करने से सम्बन्धित वैश्विक प्रयासों में सक्रिय भागीदारी निभा रहा है।”

संसद में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने न केवल इस मुद्दे के महत्व को स्वीकारा अपितु बताया भी कि सरकार इस मुद्दे पर सक्रिय है और बीस देशों से उन भारतीय नागरिकों के बारे में सूचनाएं आदान-प्रदान करने हेतु बातचीत कर रही है जिन्होंने अपना धन कर बचाकर या गलत तरीके से कमाकर विदेश में रखा है।

अब देश केवल स्वीकारोक्तियों और घोषणाओं से शांत होकर बैठने वाला नहीं है। दो वर्ष पूर्व जब भाजपा ने इस मुद्दे को उठाया था तब से कांग्रेसी नेता, भाजपा टास्क फोर्स द्वारा विदेशों में रखे गए ऐसे धन के अनुमानों को रफा-दफा करने की कोशिशों में लगे रहे। एक वरिष्ठ कांग्रेसी मंत्री ने कहा था कि ये अनुमान अपुष्ट स्रोतों और इंटरनेट पर आधारित है।

भाजपा द्वारा गठित टास्क फोर्स के सदस्य थे श्री एस. गुरुमूर्ति (चाटर्ड एकाउंटेट और खोज परक लेखक, चेन्नई), श्री अजित ढोवाल (सुरक्षा विशेषज्ञ, नई दिल्ली), डा. आर. वैद्यनाथन (वित्त प्रोफेसर, भारतीय प्रबंध संस्थान, बंगलुरु) और श्री महेश जेठमलानी (वरिष्ठ अधिवक्ता, मुंबई)। इस टास्क फोर्स ने विभिन्न स्रोतों का अध्ययन करके यह अनुमान बताया कि २५लाख करोड़ से ७० लाख करोड़ रुपए के बीच का भारतीय धन विदेशों के टैक्स हेवन्स में जमा है।

यह महत्वपूर्ण है कि गत् सप्ताह संसद में प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए भाषण को मुंबई के एक अंग्रेजी दैनिक ने प्रमुखता से प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने बताया कि भारत ने स्विटजरलैंड सहित बीस देशों से इस संबंध में बातचीत पूरी कर ली है,और साथ ही दैनिक ने विदेशों में जमा ऐसे भारतीय धन की अनुमानत: राशि उतनी ही बताई है जो भाजपा के टास्क फोर्स ने बताई थी। मुंबई का दैनिक डीएनए (6 मार्च, 2010) लिखता है: हालांकि स्विटजरलैंड सहित ऐसे टैक्स हेवन्स में जमा राशि के बारे में कोई अधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, फिर भी अनुमान है कि भारतीय नागरिकों का ऐसा काला धन 140 बिलियन अमेरिकी डालर है ।

जब तक पश्चिम प्रभुत्ववाली अर्थव्यवस्था अमेरिका और भारत सहित अन्य पश्चिमी देशों के लिए अच्छी चल रही थी तब तक इन टैक्स हेवन्स के बैंकों के गोपनीय नियमों से कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन हाल ही के वैश्विक आर्थिक संकट ने न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा अपितु ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे अनेक यूरोपीय देशों ने अपने रुख में बदलाव कर, इन देशों में बैंकिग गोपनीय नियमों को बदलने के प्रयासों में एकजुट होकर प्रयास शुरु किए हैं।

गत् वर्ष वाशिंगटन ने बड़े स्विस बैंक यूबीएस को उन ४४५० अमेरिकी ग्राहकों के नाम बताने पर बाध्य किया जिन पर स्विटजरलैंड में धन छुपाने का संदेह था।

संयोगवश,मैं उल्लेख करना चाहूंगा कि स्विस बैंकों इत्यादि में गुप्त ढंग से जमा भारतीय धन के बारे में एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लम्बित है और इसमें पुणे के एक स्टड-फार्म स्वामी, हसन अली खान का विशेष रुप से उल्लेख है जिसने स्विटजरलैंड के यूबीएस बैंक में भारी राशि जमा की हुई है। यह भी ज्ञात हुआ है कि सम्बंधित बैंक ने इसकी पुष्टि की है लेकिन भारतीय अधिकारी,स्विस सरकार द्वारा मांगे गए उपयुक्त दस्तावेजों को अभी तक दे पाने में सफल नहीं हो पाए हैं!

मैंने डा.मनमोहन सिंह के साथ सबसे पहले यह मुद्दा तब उठाया था जब जर्मनी ने सार्वजनिक रुप से घोषणा की कि उसे लीशेंस्ताइन (Liechenstein) से टैक्स हेवन्स में खाता रखने वाले जर्मन नागरिकों की सूची मिली है, और संयोग से इसमें कुछ भारतीय नाम भी सम्मिलित थे। यदि उनसे अधिकारिक तौर पर पूछा जाता तो वह भारत को साथ सूचना देने को इच्छुक थे। ऐसा माना जाता है कि तब से अब तक हमारी सरकार को पचास नामों की सूची प्राप्त हुई है। भारत सरकार ने इन नामों को सार्वजनिक करने से इस आधार पर मना कर दिया है कि जर्मनी ने ऐसे रहस्योद्धाटनों पर कुछ कानूनी शर्तें लगा दी है। यह बड़ा अटपटा है कि जर्मनी ने अपनी सूची तो जारी कर दी है और वह चाहता है कि भारतीय नाम पर्दे में ही छिपे रहें। या यह हमारी अपनी झिझक है?

अब सरकार ने संसद को औपचारिक रुप से बताया है कि स्विटजरलैंड सहित बीस देशों से उसकी बातचीत पूरी हो गई है।

मैं मानता हूं कि आज यह जो स्थिति बनी है वह मुख्य रुप से इसलिए बनी हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया। मुझे प्रसन्नता है कि चुनाव अभियान के दौरान यह मुद्दा लोगों में चर्चा का गरमागरम मुद्दा बना। स्वामी रामदेवजी जैसे संन्यासियों ने इसका अपने प्रवचनों में उल्लेख किया। फाइनेंसियल टाइम्स में ”इंडिया’स कर्स ऑफ ब्लैकमनी” शीर्षक से प्रकाशित लेख के लेखक रेमण्ड बेकर (निदेशक, ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी) ने लिखा है कि: ”भारत ने दिखा दिया है कि यह मुद्दा मतदाताओं को छूता है। अन्य विकासशील लोकतंत्र के राजनीतिज्ञों को इसे ध्यान में रखना समझदारी होगी।”

मैं इस पर जोर देना चाहता हूं कि यह सरकार का कर्तव्य है कि वह लोगों को बताए कि बीस देशों से हुई बातचीत का क्या नतीजा निकला है। मैं आग्रह करना चाहूंगा कि इस मुद्दे पर एक श्वेतपत्र प्रकाशित किया जाए और पूरे देश को विश्वास में लिया जाए।

अंत में सभी देश-वासियों को मेरी ओर से नव-संवत्सर, उगादी, गुढ़ी पड़वा, चेती चंड एवं चैत्र नवरात्री की हार्दिक शुभ-कामनाएँ.

लाल कृष्ण आडवाणी
नई दिल्ली

15 मार्च, 2010

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15 Responses to “विदेश में जमा गुप्त भारतीय धन पर श्वेत पत्र की जरुरत”

  1. shashikant Says:

    Central Govt. should do something now, Black money ka nanga nanch ho raha hai…..

  2. tanu gaur Says:

    मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं आपको प्रधानमन्त्री बनते देखूँ. और आप जब प्रधानमन्त्री बने तो आप ही गुप्त धन को देश में लाने का गौरव पायें. यही मेरी इच्छा है.

  3. बवाल Says:

    हम भी तनु गौर जी की इस बात से सहमत हैं जी के–

    “मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं आपको प्रधानमन्त्री बनते देखूँ. और आप जब प्रधानमन्त्री बने तो आप ही गुप्त धन को देश में लाने का गौरव पायें”.

    काश ऐसा हो जाए।

  4. कृष्ण मुरारी प्रसाद Says:

    आडवानी जी, ऐसा क्यों होता है कि भारतीय राजनीति में जब सांप गुजर जाता है तभी लोग लकीर पीटते नजर आतें हैं ? वो भी तब, जब सत्ता से बाहर रहते हैं….

    क्या सत्ता का काला चश्मा इतना जरूरी है कि अंधा हुए बिना काम नहीं चलता है? मुझे माननीय वाजपेयी जी की ही पंक्तियाँ याद आ रही है…..

    तब भी पहरेदार थे, अब भी पहरेदार….
    तब थे सीना तानते, अब झुकते हर बार….

  5. अनुनाद सिंह Says:

    श्वेत-पत्र तो आना ही चाहिये किन्तु इसके आगे भी कार्यवाही होनी चाहिये। भारत का धन भारत के हित में उपयोग नहीं आ रहा है ; भारत की प्रतिभा विदेशों के लिये काम कर रही है ; भारत का श्रमिक विदेशों में अपना श्रम बेच रहा है (अपने देश में काम क्यों नहीं है? क्योंकि काम निकालने के लिये दूरदृष्टि और योजना-निर्माण की जरूरत है)।

    आशा है आप इसी तरह महत्वपूर्ण विषयों पर समय-समय पर लिखने का समय निकाल पायेगें।

  6. shankar dutt fulara Says:

    आपने ये गलत लिखा है कि “ये मुद्दा सबसे पहले आपकी पार्टी ने उठाया”,आपसे भी पहले बाबा रामदेव ने इस मुद्दे को आम जनता के सामने उठा दिया था, और आज तक भी उठा रहे हैं. पर भ्रष्ट और उदासीन लोग बाबा जी को नजर अंदाज करने की कोशिश कर रहे हैं. “भ्रष्टों को कैसे रास आ सकता है ऐसा राष्ट्रवाद”मेरा लेख अवश्य पढ़ें.

  7. Swapna Manjusha 'ada' Says:

    आदरणीय अडवानी जी,
    प्रणाम,
    अच्छा लगा देख कर की आपका भी ब्लॉग है..मैं तो पहली बार आ रही हूँ..
    औरों की बात मैं नहीं जानती, परन्तु मैं अपनी बात कहना चाहती हूँ, ठीक लगे तो पोस्ट कीजियेगा वर्ना कोई बात नहीं…
    मुझे नहीं लगता की अब आप प्रधानमंत्री जैसी पोस्ट को सम्हाल पायेंगे…अब देश को युवा सोच और युवाओं की ज़रुरत है..आप अगर युवा ऊर्जा का उपयोग करें और अपने अनुभव से उनका मार्गदर्शन करें तो ज्यादा बेहतर है….कई मामलों में हमें अपनी सोच बदलनी होगी अगर हम international politics में अपनी जगह बनाना चाहते हैं तो….हमारे देश में talent की कोई कमी नहीं है कमी है तो…उनको सामने आने देने की…अगर स्वार्थपरता से लोग बाहर आकर सही मायने में देश-हित का सोचें तो बहुत कुछ किया जा सकता है…और मुझे व्यक्तिगत रूप से आपसे भी यही उम्मीद है..
    धन्यवाद…

  8. Dipak 'Mashal' Says:

    दुःख तो इस बात का है कि ७०% से ज्यादा जनता को इस मुद्दे से कोई सरोकार नहीं.. वो समझ ही नहीं पा रही कि इस धन से देश की कितनी तरक्की हो सकती है. काश समझ पाती ये जनता तो आज शायद इतनी महंगाई ना झेलनी पड़ती. अच्छे लेख के लिए आभार.

  9. dhiru singh Says:

    छ साल बहुत होते है इन सब के लिये …………………… आप इतना तो कर सकते है कि भा ज पा के सभी नेताओ से शपथ पत्र दिला दे उनका कोइ ऎसा खाता नही है.

  10. वीरेन्द्र Says:

    श्री अडवाणी जी,

    आपकी बात उचित है. परन्तु मुझे आशा है कि यह लिखते समय आपके संज्ञान में मध्य प्रदेश सरकार के मंत्रियों की अकूत संपत्ति भी होगी. यदि यह जानने के बाद भी लिखा है तो प्रशंसनीय है। बहरहाल इतना तो कर ही सकते हैं कि आयकर विभाग से छापा पड़े हुये मंत्रियों को ही मंत्रिमण्डल से निकलवा दें। ब्लेक मनी स्विस बैंक में तब पहुँचती है जब वह पैदा होती है. मध्य प्रदेश के छह मंत्रियों के बारे में तो प्रदेश का बच्चा बच्चा जानता है कि वे कितने भ्रष्ट हैं।

  11. प्राइमरी का मास्टर Says:

    श्वेत-पत्र तो आना ही चाहिये किन्तु इसके आगे भी कार्यवाही होनी चाहिये।

  12. प्रीतीश बारहठ Says:

    आदरणीय Sir,

    भारतीय जनता पार्टी जो अपने आप को अलग और अनुशासित पार्टी कहती थी, आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी है, अनुशासन नहीं है और आज तो उसके पास कोई दृष्टि भी नहीं है।यदि इस पार्टी को कांग्रेस जितने अवसर मिले होते तो इसका क्या हस्र होता इसका अनुमान लगाया जा सकता है। विदेशों में भारतीय धन के मुद्दे पर आप भारतीय जनता को सही कन्वेस करने में विफल रहे हैं। यह धन भारत में आना तो चाहिये लेकिन आप समेत सभी राजनेताओं को जनता को यह विश्वास भी दिलाना चाहिये कि वह धन जनता के ही काम आयेगा, इसकी गारंटी आप तो दें।

  13. vikasmehta Says:

    आडवानी जी,

    आपका मुद्दा देश से जुड़ा है. काले धन को देश में वापस लाने के लिए आपका प्रयास सराहनीय है. मैं आपका धन्यवाद् करता हूँ इस मुद्दे को उठाने के लिए.

  14. naresh singh rathore Says:

    यहा गाँव से लेकर दिल्ली तक सभी पार्टियों के नेता गले तक भ्रस्टाचार में डूबे है |

  15. gbpathak Says:

    You are very concerned about black money in foreign banks but have you ever tried to know how many people of your party are involved in it ? Are all your party members clean in this respect?

    Common man has no money to accumulate in foreign banks. They don’t have that much money to deposit in their own national banks. It is the lot of corrupt politicians and high level officials who are guilty and tragedy is who will bell the cat. Since Govt is not sincere in this regard so there is no way out. The game will continue and spectators will continue howling.

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