सही सेक्यूलरिज्म को समझना
इस सप्ताह मेरे पुस्तकालय में एक और महत्वपूर्ण पुस्तक-अमित मेहरा द्वारा लिखित एक सुन्दर कॉफी टेबल बुक India : A timeless Celebration जुड़ गई है। मैं इस महत्वपूर्ण पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए विदेश मंत्रालय के पब्लिक डिप्लोमेसी डिवीजन को बधाई देता हूं।
अमित मेहरा एक उत्कृष्ट फोटोग्राफर हैं। वे कई विख्यात पत्र-पत्रिकाओं जैसे- टाइम, इंडिया टुडे, डेर स्पेजेल, फॉरच्यून, वॉग (vogue) आदि में योगदान देते रहे हैं। अमितदास गुप्ता की प्रस्तावना और जया रामनाथान द्वारा मेहरा के फोटोग्राफ्स के संदर्भ में लिखित टिप्पणियां पढ़ने योग्य हैं।
समकालीन इंगलिश की लांगमैन डिक्शनरी के अनुसार - ”कॉफी टेबल बुक एक मंहगी और बड़ी पुस्तक होती है जिसमें आमतौर पर ढेर सारी तस्वीरें होती हैं और ऐसा माना जाता है कि यह पढ़ने के लिए नहीं बल्कि देखने के लिए होती हैं।”
इसमें कोई शक नहीं है कि अमित मेहरा ने इस पुस्तक में जो तस्वीरें शामिल की हैं, वे संजोने लायक हैं। लेकिन मार्क टुली द्वारा लिखी गई प्रस्तावना में मेरी ज्यादा दिलचस्पी बनी। वे 25 वर्ष तक भारत और दक्षिण्ा एशिया में बीबीसी में विख्यात पत्रकार रहे हैं। मैं उनको लम्बे समय से जानता हूं और उनका प्रशसंक हूं। वे अब भारत में बस गए हैं और उन्होंने भारत तथा भारतीय संस्कृति पर कई प्रबुध्द पुस्तकें लिखी हैं।
भारत और दक्षिण एशिया
में बीबीसी के विख्यात
पत्रकार मार्क टुली
मार्क टुली प्रस्तावना के शुरू में लिखते हैं :
मैंने 80 के दशक में एक पुस्तक-’नो फुल स्टोप्स इन इंडिया’ लिखी थी जिसमें भारत की अनोखी सहनशील संस्कृति का गुणगान किया था। अमित मेहरा ने अपनी इसी पुस्तक में यह प्रशंसा करते हुए इस बात का भी जिक्र किया है कि इस संस्कृति को उन भारतीयों से खतरा है जो आधुनिक पश्चिमी भौतिकवादी संस्कृति की नकल कर रहे हैं। जब टेलीविजन पर साक्षात्कार लेने वाले एक पत्रकार ने कहा कि मैं भारतीयों को फिर से एक काल्पनिक स्वर्ण युग में ले जाना चाहता हूं जो कभी नहीं था, तो मैंने जवाब दिया ”इसके विपरीत, मैं सहनशील संस्कृति के बारे में बात कर रहा हूं जिसे भारत ने अपने पूर्वजों से पाया है। ऐसी संस्कृति जिसमें आज के भारत का सेक्यूलरवाद समाहित है।” उसके बाद मैंने पूछा-”क्या आप भारत को भारत ही रहने देना चाहते हैं या पश्चिम की नकल?” तब से भारत बहुत बदल चुका है और हमें बदलाव को उल्लास के साथ मनाना चाहिए। लेकिन मुझे लगता है कि यह प्रश्न आज भी काफी प्रासंगिक है।
अब भारत की पहचान अपनी ही शक्ति के कारण बनी है। एक ऐसा देश जो भौतिक और मानव संसाधन के बल पर वैश्विक बाजार में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की क्षमता रखता है। लेकिन बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था जिससे यह बदलाव आया है, की सफलता से भारत में बहुत से लोग यह विश्वास करने लगे है कि देश का भविष्य इस अर्थव्यवस्था में ही निहित है। मेरी धारणा है कि यह भारतीय संस्कृति के मूलभूत सिध्दांत के विपरीत है - वह सिध्दांत जिसने भारत को सहनशील बनाया है। वह सिध्दांत निश्चित की अनिश्चितता को स्वीकार करता है। इसे स्वीकार करने के लिए कोई अंतिम अथवा पूर्ण उत्तर नहीं है जिसे ध्यान में रखा जा सके। मैंने ‘नो फुल स्टोप्स इन इंडिया’ में लिखा है ”पश्चिमी दुनिया और उसकी नकल करने वाला भारतीय अभिजातवर्ग भारतीय प्रतिभा की महत्ता को नकारता है। वे पूर्णविराम लगाना चाहते हैं लेकिन भारत भूमि पर पूर्णविराम की कोई जगह नहीं है।” यद्यपि उस पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद बहुत से बदलाव हुए हैं, इसके बावजूद मैं मानता हूं कि मैंने जो लिखा था वह सही था।
टुली आगे कहते हैं :
भारतीय सेक्यूलरवाद, जैसाकि अमित मेहरा की तस्वीरें दर्शाती हैं, सभी धर्मों का आदर करता है और भारतीय लोगों द्वारा माने जाने वाले विविध धर्मों एवं पंथों में पनपता है। मैंने दिल्ली में एक दिन सुबह बीबीसी वर्ल्ड रेडियो सेवा की एक चर्चा में यह सुना कि किसी को भी क्रिसमस कार्ड नहीं भेजा जाना चाहिए क्योंकि वे सेक्यूलर नहीं है। सेक्यूलरिस्ट ब्रिटिशों को क्रिसमस के सभी रंगों, हर्षोल्लास, लंदन की ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट की जगमगाती रोशनी, रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों से ऊंचे बनाए गए क्रिसमस वृक्षों, घर-घर आनन्द के गीत गाते गायकों से दूर रखना चाहते थे क्योंकि ये चीजें ईसाईयत का प्रचार करती हैं। उनका यह विचार था कि कार्डों में केवल नीरस और निरूत्साही सन्देश ही होता है” हैप्पी, मिड विंटर फेस्टीवल।” इस विचार के सुनने के बाद मैंने हिन्दू दैनिक समाचार-पत्र पढ़ने के लिए लिया और देखा कि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल कलकत्ता के बीच स्थित अपने घर के लॉन में बच्चों के लिए क्रिसमस पार्टी दे रहे हैं। ये राज्यपाल गोपाल गांधी थे और वे अपने दादा महात्मा गांधी के कदमों का अनुकरण कर रहे थे। गांधीजी ने एक बार कहा था - ”मेरे हिन्दू धर्म ने मुझे सभी धर्मों का आदर करने की शिक्षा दी है।”
मैंने भारत के एक शीर्ष इस्लामिक विद्वान मौलाना वहीदुदीन खान से बात की थी। उन्होंने मुझसे कहा,”मैं एक मुस्लिम हूं, इस्लाम मेरा धर्म है लेकिन मैं अन्य धर्मों का भी उतना ही आदर करता हूं।” मैं यह भी मानता हूं कि भारत में मुसलमान अन्य इस्लामिक देशों की अपेक्षा अच्छी स्थिति में है। इस्लामिक देशों में उन्हें या तो शांति मिलती है या स्वतंत्रता। लेकिन भारत में उन्हें ये दोनों ही मिलती हैं। एक क्रिश्चियन के तौर पर मुझे यहां जो स्वतंत्रता प्राप्त है उसका मैं आनन्द उठाता हूं। एक हिन्दू गुरू अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने मुझसे कहा, ”बहुत सी नदियां समुन्द्र में जाकर मिलती हैं वे सभी भिन्न हैं; कुछ उबड़-खाबड़ और तिरछी हैं तो कुछ सीधी बहती हैं लेकिन वे सभी समुन्द्र में मिलना चाहती हैं। इसलिए, भगवान के आशीर्वाद से ईश्वर तक पहुंचने के कई तरीके हैं।” जब मैं पहली बार भारत आया था तो मुझे विश्वास नहीं होता था कि ऐसी भी है। मैं सोचता था कि ईश्वर तक पहुंचने का एक ही माध्यम है-ईसाईयत। भारत की सहनशीलता और इसके सेक्यूलरिज्म ने मेरी धारणा को बदल दिया।
मार्क टुली ने अपनी प्रस्तावना की समाप्ति कुछ टिप्पणियों से की है :
मैंने शुरूआत लगभग एक वर्ष पहले लिखी अपनी पुस्तक से उध्दरण देकर की थी और अंत अभी हाल में लिखी गई पुस्तक India’s Unending Journey से उध्दरण के साथ करता हूं। पुस्तक में-भारत की सहनशीलता, अनेकतावाद, तार्किक और अतार्किक परम्परा, निश्चितता के सम्बन्ध में अनिश्चितता की स्वीकार्यता का वर्णन है । इन सबको मैंने समझा है कि ये वे संदेश हैं जो भारत दुनिया को दे सकता है। मैंने लिखा है, ”भारत में मेरे अनुभव ने मुझे अपने विश्वास व धारणा पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया क्योंकि मैं उस सत्य को नकार नहीं सकता था जो मेरी आंखों के सामने था : भगवान तक पहुंचने के कई रास्ते हैं। जब मैं इस बात को समझ सका तो मुझे पता चला कि विभिन्न देशों की विविध संस्कृतियों और वातावरण में हजारों वर्षों से बदलती हुई ऐतिहासिक परिस्थितियों में लोगों ने इसी प्रकार के यथार्थ का अनुभव किया था, यद्यपि उन्होंने इस यथार्थ का अलग तरह से वर्णन किया है। मैंने देखा कि सार्वभौमिक ईश्वर की महत्ता अधिक व्यापक है। जबकि ईसाईयत का कार्यक्षेत्र एक सीमा तक सीमित हैं। इसकी शिक्षा मुझे भारत में मिली। संशय के बारे में प्रश्न उठाने का कोई कारण तो होता है। इसका अर्थ है कि हमें विनम्र होना चाहिए। हमें ऐसा कभी नहीं मानना चाहिए कि हमारे पास सभी प्रश्नों का उत्तर मौजूद है। यही भारतीय संस्कृति है जिसे अमित मेहरा की तस्वीरों में अच्छी तरह से रेखांकित किया गया है।
***
भारतीय जनता पार्टी यह मानती है कि जिन परिस्थितियों में भारत ने सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की थी उससे दुनिया को आश्चर्य नहीं होता यदि भारत भी स्वयं को मजहबी राष्ट्र घोषित कर देता क्योंकि पाकिस्तान ने अपने आपको इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर दिया था। जैसाकि मैंने अपनी आत्म-कथा ‘मेरा देश मेरा जीवन’ में लिखा है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख (सरसंघ चालक) रहे श्री गुरूजी गोलवलकर ने सशक्त रूप से सन् 1948 में कहा था कि मजहबी राष्ट्र भारत की संस्कृति और मान्यताओं से मेल नहीं खाता है। पश्चिम में, सेक्यूलर शब्द का अलग अर्थ होता है इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन भारत ने इस शब्द को बिल्कुल भिन्न अर्थ दिया है। इसकी व्याख्या सर्व पंथ समादर अर्थात सभी धर्मों के प्रति बराबर का आदर के रूप में की गई है। यह पुस्तक और मार्क टुली की प्रस्तावना इस व्याख्या को अच्छे ढंग से निरूपित करती है।
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March 3rd, 2009 at 11:55 am
तीन पेज का छोटा सा उत्तर
कुलदीप को भेजे गए जवाब के आखिरी पैराग्राफ में अटलजी लिखते हैं कि आपके लंबे पत्र का छोटा सा उत्तर भेज रहा हूं। उनके द्वारा लिखे गए इस वाक्यांश से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुलदीप ने कितना लंबा पत्र उन्हें लिखा था, जिसमें वे तमाम बातें थीं जिनकी बदौलत भाजपा की 1985 के चुनाव में ऐसी दुर्दशा हुई थी।
नईदुनिया के इस पत्रकार ने मांगी राष्ट्रपति से सपरिवार इच्छामृत्यु की इजाजत
इंदौर से प्रकाशित मध्यप्रदेश के भाषाई समाचार पत्र नईदुनिया के अभय छजलानी और प्रधान संपादक आलोक मेहता को इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री से सम्मानित किए जाने के परिप्रेक्ष्य में यह जान लेना कम दिलचस्प नहीं होगा कि संस्था में कर्मचारियों का कॅरियर किस प्रकार तक चैपट कर उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। संस्था ने एक कर्मचारी को इतना परेशान किया कि उसने मजबूर होकर राष्ट्रपति से सपरिवार इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी।
March 4th, 2009 at 12:26 pm
इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद हुए चुनाव में जब अटलजी स्वयं ग्वालियर से चुनाव हार गए थे, तब भाजपा अध्यक्ष होने के नाते कुलदीप ने अटलजी को एक लंवा विश्लेषणात्मक पत्र लिखा था, जिसमें उन कारणों को गिनाया गया था, जिसकी बदौलत पार्टी को केवल दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। लोगों के जेहन में यह बात अवश्य आएगी कि क्यों कुलदीप इस बात को महत्व देते हैं कि उनकी वजह से ही अटलजी प्रधानमंत्री बने? ऐसे न जाने कितने पत्र उन्हें मिलते होंगे? तो इसकी तारीख पर गौर किया जाना सबसे जरूरी है, क्योंकि 19 मार्च 1985 को कुलदीप द्वारा अजमेर से लिखे गए पत्र के ठीक 13 साल बाद यानी 19 मार्च 1998 को अटलजी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
गांधीवादी समाजवाद की जगह आया राम मंदिर का मुद्दा
कुलदीप द्वारा अटलजी को भेजे गए इस पत्र में यह तो हुई 13 के आंकड़े की बात। अब आती है मुद्दों की बात तो सबसे बड़ा मुद्दा तो यही है कि इस पत्र के बाद से अपनी हिन्दूवादी छवि को बनाने के लिए राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, अन्यथा अटलजी तो इसे गांधीवादी समाजवाद की ओर ले जाने को तत्पर थे।
March 4th, 2009 at 12:28 pm
इस पत्र से पहले तक छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसी कोई बात थी ही नहीं
कुलदीप के पत्र का जवाब देते हुए अटलजी ने अपने पत्र में कहा कि जहां तक सेक्यूलर होने का सवाल है, जनसंघ और भाजपा की नीतियों में कोई अंतर नहीं है। इस समय तक भाजपा के शब्दकोश में छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसा कोई शब्द था ही नहीं,। अपने पत्र के माध्यम से कुलदीप ने जब इस बाबद सवाल किया तो ही छद्म धर्मनिरपेक्षता उपजा और आक्रामक रूप से कांग्रेस पर हमला बोला गया।
एकता यात्रा का परिणाम भी रहा यह पत्र
इस पत्र के लिखे जाने से पहले तक कश्मीर के लिए बनाई गई धारा 370 के बारे में लोगों में जागरूकता का अभाव था। हर आम और खास को इसकी जानकारी हो सके इसके लिए ही मुरलीमनोहर जोशी ने एकता यात्रा की पहल की थी।
शुरुआत के 6-7 साल तक अन्य दलों से तालमेल से किया परहेज
कुलदीप द्वारा पत्र लिखे जाने के बाद हुए चुनावों में अन्य दलों से तालमेल करने से परहेज किया गया। यह सिलसिला केवल 6-7 साल तक कायम रहा, लेकिन बाद में इसे छोड़ दिया गया।