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	<title>Comments on: सही सेक्यूलरिज्म को समझना</title>
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	<pubDate>Fri, 10 Feb 2012 07:08:15 +0000</pubDate>
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		<title>By: sangeeta makwana</title>
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		<dc:creator>sangeeta makwana</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Mar 2009 06:58:20 +0000</pubDate>
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		<description>इस पत्र से पहले तक छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसी कोई बात थी ही नहीं
कुलदीप के पत्र का जवाब देते हुए अटलजी ने अपने पत्र में कहा कि जहां तक सेक्यूलर होने का सवाल है, जनसंघ और भाजपा की नीतियों में कोई अंतर नहीं है। इस समय तक भाजपा के शब्दकोश में छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसा कोई शब्द था ही नहीं,। अपने पत्र के माध्यम से कुलदीप ने जब इस बाबद सवाल किया तो ही छद्म धर्मनिरपेक्षता उपजा और आक्रामक रूप से कांग्रेस पर हमला बोला गया।
एकता यात्रा का परिणाम भी रहा यह पत्र
इस पत्र के लिखे जाने से पहले तक कश्मीर के लिए बनाई गई धारा 370 के बारे में लोगों में जागरूकता का अभाव था। हर आम और खास को इसकी जानकारी हो सके इसके लिए ही मुरलीमनोहर जोशी ने एकता यात्रा की पहल की थी।
शुरुआत के 6-7 साल तक अन्य दलों से तालमेल से किया परहेज
कुलदीप द्वारा पत्र लिखे जाने के बाद हुए चुनावों में अन्य दलों से तालमेल करने से परहेज किया गया। यह सिलसिला केवल 6-7 साल तक कायम रहा, लेकिन बाद में इसे छोड़ दिया गया।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इस पत्र से पहले तक छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसी कोई बात थी ही नहीं<br />
कुलदीप के पत्र का जवाब देते हुए अटलजी ने अपने पत्र में कहा कि जहां तक सेक्यूलर होने का सवाल है, जनसंघ और भाजपा की नीतियों में कोई अंतर नहीं है। इस समय तक भाजपा के शब्दकोश में छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसा कोई शब्द था ही नहीं,। अपने पत्र के माध्यम से कुलदीप ने जब इस बाबद सवाल किया तो ही छद्म धर्मनिरपेक्षता उपजा और आक्रामक रूप से कांग्रेस पर हमला बोला गया।<br />
एकता यात्रा का परिणाम भी रहा यह पत्र<br />
इस पत्र के लिखे जाने से पहले तक कश्मीर के लिए बनाई गई धारा 370 के बारे में लोगों में जागरूकता का अभाव था। हर आम और खास को इसकी जानकारी हो सके इसके लिए ही मुरलीमनोहर जोशी ने एकता यात्रा की पहल की थी।<br />
शुरुआत के 6-7 साल तक अन्य दलों से तालमेल से किया परहेज<br />
कुलदीप द्वारा पत्र लिखे जाने के बाद हुए चुनावों में अन्य दलों से तालमेल करने से परहेज किया गया। यह सिलसिला केवल 6-7 साल तक कायम रहा, लेकिन बाद में इसे छोड़ दिया गया।</p>
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		<title>By: sangeeta makwana</title>
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		<dc:creator>sangeeta makwana</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Mar 2009 06:56:43 +0000</pubDate>
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		<description>इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद हुए चुनाव में जब अटलजी स्वयं ग्वालियर से चुनाव हार गए थे, तब भाजपा अध्यक्ष होने के नाते कुलदीप ने अटलजी को एक लंवा विश्लेषणात्मक पत्र लिखा था, जिसमें उन कारणों को गिनाया गया था, जिसकी बदौलत पार्टी को केवल दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। लोगों के जेहन में यह बात अवश्य आएगी कि क्यों कुलदीप इस बात को महत्व देते हैं कि उनकी वजह से ही अटलजी प्रधानमंत्री बने? ऐसे न जाने कितने पत्र उन्हें मिलते होंगे? तो इसकी तारीख पर गौर किया जाना सबसे जरूरी है, क्योंकि 19 मार्च 1985 को कुलदीप द्वारा अजमेर से लिखे गए पत्र के ठीक 13 साल बाद यानी 19 मार्च 1998 को अटलजी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। 
गांधीवादी समाजवाद की जगह आया राम मंदिर का मुद्दा
कुलदीप द्वारा अटलजी को भेजे गए इस पत्र में यह तो हुई 13 के आंकड़े की बात। अब आती है मुद्दों की बात तो सबसे बड़ा मुद्दा तो यही है कि इस पत्र के बाद से अपनी हिन्दूवादी छवि को बनाने के लिए राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, अन्यथा अटलजी तो इसे गांधीवादी समाजवाद की ओर ले जाने को तत्पर थे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद हुए चुनाव में जब अटलजी स्वयं ग्वालियर से चुनाव हार गए थे, तब भाजपा अध्यक्ष होने के नाते कुलदीप ने अटलजी को एक लंवा विश्लेषणात्मक पत्र लिखा था, जिसमें उन कारणों को गिनाया गया था, जिसकी बदौलत पार्टी को केवल दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। लोगों के जेहन में यह बात अवश्य आएगी कि क्यों कुलदीप इस बात को महत्व देते हैं कि उनकी वजह से ही अटलजी प्रधानमंत्री बने? ऐसे न जाने कितने पत्र उन्हें मिलते होंगे? तो इसकी तारीख पर गौर किया जाना सबसे जरूरी है, क्योंकि 19 मार्च 1985 को कुलदीप द्वारा अजमेर से लिखे गए पत्र के ठीक 13 साल बाद यानी 19 मार्च 1998 को अटलजी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।<br />
गांधीवादी समाजवाद की जगह आया राम मंदिर का मुद्दा<br />
कुलदीप द्वारा अटलजी को भेजे गए इस पत्र में यह तो हुई 13 के आंकड़े की बात। अब आती है मुद्दों की बात तो सबसे बड़ा मुद्दा तो यही है कि इस पत्र के बाद से अपनी हिन्दूवादी छवि को बनाने के लिए राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, अन्यथा अटलजी तो इसे गांधीवादी समाजवाद की ओर ले जाने को तत्पर थे।</p>
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		<title>By: jonathan lal</title>
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		<dc:creator>jonathan lal</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Mar 2009 06:25:13 +0000</pubDate>
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		<description>तीन पेज का छोटा सा उत्तर
कुलदीप को भेजे गए जवाब के आखिरी पैराग्राफ में अटलजी लिखते हैं कि आपके लंबे पत्र का छोटा सा उत्तर भेज रहा हूं। उनके द्वारा लिखे गए इस वाक्यांश से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुलदीप ने कितना लंबा पत्र उन्हें लिखा था, जिसमें वे तमाम बातें थीं जिनकी बदौलत भाजपा की 1985 के चुनाव में ऐसी दुर्दशा हुई थी।

 
नईदुनिया के इस पत्रकार ने मांगी राष्ट्रपति से सपरिवार इच्छामृत्यु की इजाजत
इंदौर से प्रकाशित मध्यप्रदेश के भाषाई समाचार पत्र नईदुनिया के अभय छजलानी और प्रधान संपादक आलोक मेहता को इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री से सम्मानित किए जाने के परिप्रेक्ष्य में यह जान लेना कम दिलचस्प नहीं होगा कि संस्था में कर्मचारियों का कॅरियर किस प्रकार तक चैपट कर उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। संस्था ने एक कर्मचारी को इतना परेशान किया कि उसने मजबूर होकर राष्ट्रपति से सपरिवार इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>तीन पेज का छोटा सा उत्तर<br />
कुलदीप को भेजे गए जवाब के आखिरी पैराग्राफ में अटलजी लिखते हैं कि आपके लंबे पत्र का छोटा सा उत्तर भेज रहा हूं। उनके द्वारा लिखे गए इस वाक्यांश से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुलदीप ने कितना लंबा पत्र उन्हें लिखा था, जिसमें वे तमाम बातें थीं जिनकी बदौलत भाजपा की 1985 के चुनाव में ऐसी दुर्दशा हुई थी।</p>
<p>नईदुनिया के इस पत्रकार ने मांगी राष्ट्रपति से सपरिवार इच्छामृत्यु की इजाजत<br />
इंदौर से प्रकाशित मध्यप्रदेश के भाषाई समाचार पत्र नईदुनिया के अभय छजलानी और प्रधान संपादक आलोक मेहता को इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री से सम्मानित किए जाने के परिप्रेक्ष्य में यह जान लेना कम दिलचस्प नहीं होगा कि संस्था में कर्मचारियों का कॅरियर किस प्रकार तक चैपट कर उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। संस्था ने एक कर्मचारी को इतना परेशान किया कि उसने मजबूर होकर राष्ट्रपति से सपरिवार इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी।</p>
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