हिन्दुइज्म का इनसायक्लोपीडिया (विश्वकोश) और महाकुंभ
गत् सप्ताह इण्डिया हैरिटेज रिसर्च फाऊण्डेशन के साथ मिलकर रूपा एण्ड कम्पनी द्वारा प्रकाशित किए जा रहे ग्यारह खण्डों वाले ‘इनसायक्लोपीडिया ऑफ हिन्दुइज्म’ की विशेष पूर्वसमीक्षा आयोजित की गई थी। नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित विवेकानन्द फाऊण्डेशन सभागार में पहले तीन खण्ड प्रदर्शित किए गए थे। इस विचार-विमर्श के कार्यक्रम का विषय ‘आधुनिक विश्व में हिन्दुइज्म’ (Hinduism in the Contemporary World) था।
दो घण्टे से अधिक चले इस प्रबुध्द और उच्चस्तरीय विचार-विमर्श को ध्यान मग्न सुनने वाले लगभग 400 श्रोताओं में मैं भी एक था। इसमें भाग लेने वाले प्रतिष्ठित वक्ताओं में स्वामी आत्मा प्रियनंदा, उपकुलपति, श्री रामकृष्ण विवेकानन्द विश्वविद्यालय; डा0 कपिल कपूर, मुख्य सम्पादक, इनसायक्लोपीडिया ऑफ हिन्दुइज्म; डा0 कविता शर्मा, निदेशक, इण्डिया इन्टरनेशनल सेंटर; डा0 लोकेश चन्द्र, विख्यात विद्वान और लेखक और साध्वी भगवती, सचिव, इण्डिया हैरिटेज रिसर्च फाऊण्डेशन प्रमुख थे।
उस शाम के विचार-विमर्श की दिशा और विषय-वस्तु ने मुझे उन अनेक बहसों का स्मरण करा दिया जो मैंने अपनी किशोरावस्था में, कराची में विद्यार्थी जीवन में सुनी थीं।
मैंने अपने जन्म 1927 से लेकर जीवन के प्रथम बीस वर्ष ब्रिटिश शासन के तहत गुजारे। पुस्तकों के प्रति मेरा मोह तभी से शुरू हो गया था जब मैं स्कूल में था। उन दिनों एक पुस्तक-केथरीन मायो द्वारा लिखित ‘मदर इण्डिया’ काफी चर्चित हुई थी। यदि कोई भी भारतीय उस पुस्तक को पढ़ लेता तो वह या तो अपने देश, संस्कृति और धर्म के प्रति धिक्कार भाव रखने लगता या ब्रिटिश उपनिवेशवादियों से घृणा शुरू करने लगता जिन्होंने देश में ऐसा माहौल बनाया था जिसमें ऐसी झूठी निंदात्मक पुस्तकों की बाढ़ आने लगी थी। गांधीजी ने इस पुस्तक को एक ‘ड्रेन इंस्पेक्टर की रिपोर्ट’ कह कर आलोचना की थी। मेयो की पुस्तक के उत्तर स्वरूप अनेक पुस्तकें लिखी गई। उनमें से एक थी लाला लाजपत राय की ‘अनहैप्पी इण्डिया’ (अप्रसन्न भारत) ।
विवेकानन्द फाऊण्डेशन के कार्यक्रम में इनसायक्लोपीडिया के मुख्य सम्पादक डा0 कपूर ने जोरदार ढंग से अपनी बात रखी कि हमारे देश के भद्रलोक द्वारा पश्चिमी संस्कृति को अपनाने का कारण वह शिक्षा पध्दति है जो ब्रिटिश शासन के दौरान हम पर थोपी गई और जिसने हमें अपनी परम्परा, उत्सवों और रीति-रिवाजों तथा विशेष रूप से हमारी भाषा संस्कृत के प्रति शर्म महसूस करने वाला और क्षमायाचक बना दिया।
थामस मैकाले के जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि मैकाले ने 1836 में अपने पिता को अत्यन्त गर्व से लिखा ”इस (अंग्रेजी) शिक्षा का प्रभाव हिन्दुओं पर आश्चर्यजनक रूप से अति विशाल है। जो हिन्दू इस शिक्षा को पा लेगा वह कभी भी अपने धर्म के प्रति सच्चा नहीं रह सकेगा। यह मेरा पक्का विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षा योजना लागू होती है तो आने वाले तीस वर्षों में बंगाल के सम्मानित वर्गों में से एक भी मूर्तिपूजक शेष नहीं बचेगा”।
राजधानी में सम्पन्न ऐसा ही सम्मेलन अप्रैल के शुरू में जब कुंभ उत्सव चल रहा है, ऋषिकेश मे आयोजित किया जा रहा है। इण्डिया हैरिटेज रिसर्च फाऊण्डेशन के अध्यक्ष, पूजनीय स्वामी चिदानंदजी जिन्होंने दो दशक पूर्व इनसायक्लोपीडिया ऑफ हिन्दुइज्म की कल्पना की थी, ने इस कार्यक्रम के लिए परम पूजनीय दलाई लामा को निमंत्रित किया है।
***
हरिद्वार का महाकुम्भ 14 जनवरी-मकर संक्रांति से शुरू हुआ और अप्रैल के मध्य यानी बैसाखी तक चलेगा।
लगभग बीस वर्षों तक बीबीसी के दक्षिण एशिया के संवाददाता के रूप में सक्रिय रहे मार्क टुली जिन्हें आपातकाल के दौरान कांग्रेस सरकार ने भारत से (तब वह दिल्ली में बीबीसी के ब्यूरो प्रमुख थे) निष्कासित कर दिया था, ने 1999 में एक पुस्तक लिखी - ‘नो फुल स्टाप्स इन इण्डिया’ - में कुंभ उत्सव की सराहना करते हुए प्रशंसा की है, और लिखा :
”कुंभ मेला दुनिया का सर्वाधिक विशाल धार्मिक उत्सव माना जाता है लेकिन कोई नहीं जानता कि यह कितना विशाल है। शायद भगवान ही अपने भक्तों का हिसाब रखते होंगे जो गंगा और इलाहाबाद में यमुना नदी में अपने पापों को धोने के लिए इस उत्सव में आते हैं। जहां तक मनुष्यों का सम्बन्ध है, उपग्रह से खींचे गए फोटो, कम्प्यूटर और आधुनिक प्रौद्योगिकी के अन्य उपकरण सम्भवतया सही-सही अंदाजा लगा सकते हैं, मगर इस उद्देश्य से अभी तक उनका उपयोग नहीं किया गया है। अत: यही कहा जा सकता है कि अधिकारिक अनुमान के अनुसार 1977 के कुंभ मेले के सर्वाधिक पवित्र दिन लगभग 1 करोड़ लोगों ने स्नान किया होगा।”
”दुनिया में कोई अन्य देश कुंभ मेले जैसा दृश्य नहीं प्रस्तुत कर सकता। यह सर्वाधिक बदनाम भारतीय प्रशासकों की विजय है लेकिन उससे ज्यादा यह भारत के लोगों की विजय है। और अंग्रेजी प्रेस इस विजय पर कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करती है? अपरिहार्य रूप से, तिरस्कार के साथ। देश के सर्वाधिक प्रभावशाली दैनिक द टाइम्स ऑफ इण्डिया ने एक लम्बा लेख प्रकाशित किया जिसमें ये वाक्य कई बार दोहराए गए थे ‘अबस्क्युअरिज्म रूल्ड दि रूट्स इन कुम्भ’, ‘कुंभ में धार्मिक कर्मकाण्ड ने तर्क को पीछे धकेला’ और ‘कुंभ में लाखों की भीड़ उमड़ी मगर ठोस कुछ नहीं निकला’। द टाइम्स ऑफ इण्डिया ने विश्व हिन्दू परिषद की राजनीति की आलोचना की लेकिन संगम पर स्नान करने वाले लाखों श्रध्दालुओं की श्रध्दा को विश्लेषित तथा वर्णित करने का कोई प्रयास नहीं किया।”
***
मार्क टुली कलकत्ता (कोलकाता) में जन्मे परन्तु बीबीसी से सेवानिवृत हो जाने के बाद भी उन्होंने भारत को अपना घर मानकर अपनाया और नई दिल्ली में बस गए हैं। टुली उन चिंतकों में अग्रणी हैं जो भारत की सेक्युलर अवधारणा को सही रूप में समझते हैं। उन्होंने बार-बार इस पर जोर दिया है कि ‘सेकुलर स्टेट’ का अर्थ ‘अधार्मिक स्टेट’ होना नहीं है। वे मानते हैं कि भारत में सेकुलरिज्म हिन्दु सहिष्णुता में से उपजा है। एक अन्य स्थान पर उन्होंने उल्लेख किया:
”एक सुबह दिल्ली में मेरी आंख बीबीसी के वर्ल्ड रेडियो सर्विस पर चल रही बहस से खुली जिसमें सुझाया जा रहा था कि क्रिसमस कार्ड नहीं भेजा जाना चाहिए क्योंकि वह सेकुलर नहीं है। सेकुलरवादी, ब्रिटिश नागरिकों को क्रिसमस का आनन्द, रंग, लंदन की आक्सफोर्ड स्ट्रीट में लाइटिंग, रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों से ऊंचे क्रिसमस ट्री, घर-घर में गाए जाने वाले कैरोल से वंचित रखना चाहते थे क्योंकि ये ईसाइयत को प्रदर्शित करते हैं। यह सुझाया गया कि कार्डों पर यह रूखा सा निर्जीव संदेश लिखा जाना चाहिए: ‘हैप्पी मिड-विंटर फेस्टिवेल’। यह विचार सुनने के बाद मैंने एक राष्ट्रीय दैनिक द हिन्दू की प्रति उठाई जिसमें मुखपृष्ठ पर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल की फोटो छपी थी जिन्होंने कोलकोता के बीचोंबीच स्थित अपने राजनिवास के प्रांगण में बच्चों के लिए क्रिसमस पार्टी का आयोजन किया था। राज्यपाल थे गोपाल गांधी और वह अपने दादा के पदचिन्हों पर चल रहे थे जिन्होंने एक बार कहा था: ‘मेरा हिन्दुइज्म मुझे सभी मजहबों का आदर करने की सीख देता है।”
लाल कृष्ण आडवानी
नयी दिल्ली
२८ मार्च, २०१०
If you enjoyed this post, make sure you subscribe to my RSS feed!


March 30th, 2010 at 9:34 am
‘मेरा हिन्दुइज्म मुझे सभी मजहबों का आदर करने की सीख देता है।”
कितना सही है यह वाक्य . लेकिन आपको स्वीकार करना पडेगा कि ८९-९० के बाद हिन्दुइज्म विवादित हो गया . और रघुपति राघव राजा राम वाले राम भी . जय श्री राम ने जय राम जी की जगह तो ली लेकिन एक नारा होने के कारण लोग असहज से दिख्ते है इसका जबाब देते समय .इस चक्कर मे अब गावं मे भी राम राम का सम्बोधन भी कम हो गया .
April 13th, 2010 at 5:39 pm
धिरु जी,
हिन्दुइज्म कभी विवादित न हुआ है और न कभी विवादित होगा. इसे विवादित करने का षड्यंत्र किसी न किसी बहाने से समय -समय पर किया जाता रहा है और दुर्भाग्य से आप जैसे लोग थोड़े घबरा जाते है. आप निश्चिन्त रहें और धर्म मे अपना विश्वास रखें.
अपने AC वाले रुम से बाहर निकल कर देखिये राम-राम का नाम लेने वालो की संख्या क्या है और किस श्रद्धा से राम का नाम लिया जाता है. धन्यवाद
शक्ति नाथ झा
shakti_ahj@yahoo.co.in