Print This Post Print This Post

12 जून का महत्व

2

आज मैं पार्टी की दो-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के लिए पटना में हूं। पार्टी अध्यक्ष श्री नितिन गडकरी द्वारा गठित नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की यह पहली बैठक होगी।

कार्यकारिणी में बहुत से पहली बार बने सदस्यों के लिए आज की तिथि अपने आप में महत्वपूर्ण होगी। लेकिन जो 1947 से देश की स्वतंत्रता के समय से घटनाक्रम को देखते आ रहे हैं, उनके लिए आज अविस्मरणीय महत्व का ऐतिहासिक दिन है।

भारत के राजनीतिक इतिहास में 12 जून एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तिथि है । यह वह तिथि है जिसे देश को नहीं भूलना चाहिए। पैंतीस वर्ष पूर्व ठीक इसी दिन दो ऐसी घटनाएं घटीं, जिनके चलते यदि सरकार के इरादे स्थायी और सफल हो जाते तो भारतीय लोकतंत्र पूर्णतया नष्ट हो गया होता। आज हम एक अलग भारत में रह रहे होते। निश्चित रूप से यह वैसा भारत नहीं होता जिसका सफल लोकतंत्र के चलते सम्मान होता है।

मैं, आज 12 जून, 1975 का स्मरण कर रहा हूं। मेरे सामने बी.एस. टण्डन द्वारा लिखित ‘पी एम ओ डायरी : प्रील्यूड टू द एमरजेंसी’ एक पुस्तक है। लगभग चार दशकों से ज्यादा समय से मैं इसके लेखक और उनके परिवार को जानता हूँ । यह परिवार पंडारा पार्क में मेरे पड़ोस में रहता था। बिशन टण्डन एक वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी थे जो श्रीमती इंदिरा गांधी के शासन में प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव थे। मोरारजी देसाई की सरकार में जब मैं सूचना एवं प्रसारण मंत्री बना तो मैंने उनके छोटे भाई गोपाल टण्डन को मंत्रालय में मेरे विशेष सहायक के रूप में चुना।

बिशन टण्डन की पुस्तक में उन दिनों की घटनाओं का तिथिवार ब्यौरा दर्ज है। 12 जून, 1975 के अंतर्गत उन्होंने दर्ज किया है:

”यह दिन इतिहास में सदैव याद रहेगा। सुबह से ही खराब समाचार आने लगे थे। तड़के सुबह मुझे समाचार मिला कि डी.पी. धर (केन्द्र सरकार में मंत्री और बाद में संयुक्त समाजवादी सोवियत संघ में राजदूत) का निधन हो गया।

प्रधानमंत्री अपने कार्यालय में नहीं आई। वे इलाहाबाद से समाचार की प्रतीक्षा कर रही थीं। विनीता राय ने 10.05 बजे मुझे फोन किया और कहा कि न्यायालय ने प्रधानमंत्री के विरूध्द निर्णय दिया है लेकिन तब तक समाचार की पुष्टि नहीं हुई थी।

मैं तुरन्त पीटीआई/यूएनआई के टेलीप्रिंटरों की तरफ गया जो मेरे और विनीता राय के कमरों के बीच में थे। वहां मैने पढ़ा कि न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने प्रधानमंत्री का चुनाव रद्द कर दिया है और उनके विरूध्द लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को सही ठहराते हुए, अगले 6 वर्षों तक उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया…..”

शाम तक गुजरात विधानसभा चुनावों के परिणाम आने शुरू हो गए थे। जनता मोर्चा (मोरारजी भाई के नेतृत्व में) जिसमें कांग्रेस (ओ), जनसंघ, लोकदल और एस.पी. शामिल थे, कांग्रेस से आगे चलता लग रहा था। ऐसा लगता था कि यदि कांग्रेस पराजित हो गई तो वास्तव में यह प्रधानमंत्री की पराजय होगी, चूंकि गुजरात चुनावों का सारा बोझ वह (इंदिरा गांधी) अपने कंधों पर संभाले हुए थीं।”

जब मई के महीने में हम जनसंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की तिथियां तय कर रहे थे तब हमें गुजरात के चुनावों के कार्यक्रम की जानकारी थी कि उसके नतीजे 12 जून को घोषित किए जाएंगे और श्रीमती गांधी के विरूध्द रायबरेली चुनाव सम्बन्धी राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश जगमोहन लाल की सुनवाई होनी है। पर हमें इसका कोई अंदेशा नहीं था कि निर्णय कब सुनाया जाएगा। गुजरात की चुनावी तिथियों के आधार पर पार्टी ने तय किया था कि जनसंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी माऊण्ट आबू में 15, 16 और 17 जून, 1975 को होगी।

गुजरात से सटे होने के कारण इस स्थान का चयन किया गया था। अधिकांश वरिष्ठ नेता लगभग एक महीने तक गुजरात के चुनाव अभियान में जुटे थे।

उन दिनों हमारी कार्यकारिणी के एक सदस्य डा. वसंत कुमार पण्डित थे, जो प्रसिध्द ज्योतिषी थे और ज्योतिष शास्त्र में पी.एच.डी. उपाधि प्राप्त थे। डा. पण्डित अठारह वर्षों तक महाराष्ट्र विधान परिषद और 1977 से 1984 तक लोक सभा के सदस्य रहे।

ज्योतिषीय भविष्यवाणियों को लेकर मैं हमेशा संशय और असमंजस की स्थिति में रहा हूँ । लेकिन मैं माऊण्ट आबू में पण्डित के साथ हुई संक्षिप्त बातचीत को कभी नहीं भूल सकता। दूसरे दिन दोपहर के भोजन के बाद आराम करते हुए मैंने वसंत कुमार से पूछा ”पण्डित जी आपके नक्षत्र क्या बोल रहे हैं ?” उनका उत्तर चक्कर में डालने वाला था । उन्होंने कहा ”आडवाणीजी, मैं स्वयं समझ पाने में असमर्थ हूं। मैं षडयंत्र सा महसूस कर रहा हूँ । मैं नक्षत्रों को जितना समझ पा रहा हूं उससे लगता है कि हम दो वर्ष के वनवास की तरफ बढ़ रहे हैं!” जून का महीना समाप्त होने से पहले ही, जैसाकि डा. वसन्त कुमार ने वनवास की भविष्यवाणी की थी उन्नीस महीने के कारावास के रूप में वनवास शुरू हो गया, न केवल कुछ नेताओं के लिए अपितु हजारों-हजार विपक्षी कार्यकर्ताओं के लिए!

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली / पटना

जून १२, २०१०

If you enjoyed this post, make sure you subscribe to my RSS feed!

Visit my website

2 Responses to “12 जून का महत्व”

  1. dhiru singh Says:

    आपातकाल ७५ मे देश पर था लेकिन अब भाजपा पर जो आपात काल है उसकी दिल से समीक्षा किजिये . अभी भी समय है . आपके यहा छोटे दिल के बडे नेताओ का जो जमावाडा है उस पर लगाम लगवाईये अगर आप सक्षम है तो. और मुख्तार नकवी के राज्य सभा सदस्य बनने पर साबित हो ही चुका है भाजपा मुस्लिम तुष्टिकरण से बहुत दूर है .

  2. सिरिल Says:

    आपका यह अनुभव पढ़कर बहुत अच्छा लगा. कृपया आगे भी कढ़़ियां ज़ारी रखें ताकी नई पीढ़ी आपके अनुभव से लाभान्वित हो पाये और हमें उन लोगों के बारे में सुनने का मौका मिले जो अब इतिहास की तहों में गुम हैं लेकिन आपकी यादों में ताज़ा.

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.