The Sufi Path

April 26, 2009


dargah-shariffClassical Sufi scholars have defined Sufism as “a science whose objective is the reparation of the heart and turning it away from all else but God.” Sufism refers to a group of mystical Muslim movements. It uses music, dancing and other means to reach a state of communion with God.

It is analogous in some senses to the Bhakti movement in Hinduism and to the various Christian monastic movements such as that of St Francis of Assisi. The Sufi path consists in cleansing the heart from whatever is other than Allah.

A Persian poem tells us what The Sufi Path (Tasawwuf ) is:

What is Tasawwuf? Good character and awareness of God.
That’s all Tasawwuf is. And nothing more.

What is Tasawwuf? Love and affection.
It is the cure for hatred and vengeance. And nothing more.

What is Tasawwuf? The heart attaining tranquility–
which is the root of religion. And nothing more.

What is Tasawwuf? Concentrating your mind,
which is the religion of Ahmad (pbuh). And nothing more.

What is Tasawwuf? Contemplation that travels to the Divine throne.
It is a far-seeing gaze. And nothing more.

Tasawwuf is keeping one’s distance from imagination and supposition.
Tasawwuf is found in certainty. And nothing more.

Surrendering one’s soul to the care of the inviolability of religion;
this is Tasawwuf. And nothing more.

Tasawwuf is the path of faith and affirmation of unity;
this is the incorruptible religion. And nothing more.

Tasawwuf is the smooth and illuminated path.
It is the way to the most exalted paradise. And nothing more.

I have heard that the ecstasy of the wearers of wool
comes from finding the taste of religion. And nothing more.

India is known for its long and widely revered tradition of Sufi saints. Amongst them is Hazrat Khwaja Moinuddin Chishti of Ajmer (popularly known as Khwaja Gharib Nawaz). Some excerpts from Shri L.K. Advani’s autobiography, My Country My Life:

Let me reiterate that I cherish the fact that India is a multi-religious country in which both our Constitution and our age-old culture brook no discrimination on the grounds of faith. Muslims and Christians have the same rights, responsibilities and opportunities as others. I greatly admire the weighty contribution that they have made to enrich many facets of our national life. I hold all faiths to be worthy of respect. Let me cite an example here. When I reached Ajmer in Rajasthan during the course of my Bharat Suraksha Yatra in 2006, my party colleagues suggested that I should visit Pushkar, a sacred Hindu shrine by the side of a lake which is believed to have been created by Lord Brahma himself. I readily agreed. But I said I would also like to offer prayers at the Dargah Sharif of Hazrat Khwaja Moinuddin Chishti, a revered Sufi saint, in Ajmer.* Although a few eyebrows were raised, I nonetheless visited both the holy places.

The concept of ‘Cultural Nationalism’ enjoins upon the adherents of different faiths in India to respect, and take pride in, the common unifying culture of our ancient land while celebrating its many diversities; not to have extra-territorial loyalty; not to denigrate other faiths as false or inferior, but rather to learn from the best that each faith has to offer. It means nothing more, nothing less.

* Footnote: Here is a report about my earlier visit to the Ajmer Dargah in 2000. ‘Home Minister L.K. Advani on Sunday prayed at Hazrat Khwaja Moinuddin Chishti’s dargah here. The local Muslims were ecstatic and thronged the dargah in huge numbers to watch the spectacle. There was a popular request from the crowd: Give a little speech. Advani readily obliged. He said: “India is a multi-religious country and people belonging to all faiths strive to be good people. That is why every community comes to this dargah. Let us be good human beings first. It does not matter if one believes in Ishwar or Allah.” He said although the twentieth century was identified with the Western world, “if all communities here worked hard unitedly, then the twenty-first century will certainly belong to Bharat.” To this the crowds responded with “Aameen”. (So be it).’ (‘A surprise: Advani prays at Ajmer dargah’; The Times of India; 4 December 2000) Later, when a journalist asked me whether my visit to the dargah was part of a larger image changing exercise, I replied, ‘My perceptions have always been clear. I am saying the same things now what I said twenty-five years ago.’

सूफ़ी मार्ग

प्राचीन सूफ़ी विद्वानों ने सूफ़ीवाद की व्याख्या ”एक ऐसी परम्परा के रूप में की है जिसका लक्ष्य सभी के दिलों को स्वच्छ बनाकर तथा अन्य सांसारिक वस्तुओं से विमुख करके ईश्वर की ओर मोड़ना है।” सूफ़ीवाद छायावादी मुस्लिम आन्दोलन के एक समूह से सम्बन्धित है। इसमें ईश्वर तक पहुंचने तथा तारतम्य स्थापित करने के लिए संगीत, नृत्य तथा अन्य साधनों का इस्तेमाल किया गया।

सूफ़ीवाद हिन्दुवाद के भक्ति आंदोलन तथा असिसी के सेन्ट फ्रांसिस जैसे विभिन्न ईसाई मठवासी आन्दोलन की कतिपय भावनाओं से मिलता-जुलता है। सूफी मार्ग में अल्लाह से भिन्न दूसरी बातों से मन हटाकर उसे निर्मल बनाने की बात कही गई है।

सूफ़ी मार्ग (तसव्वुफ़) क्या है, उसकी व्याख्या फ़ारसी की एक कविता में की गई है :

तसव्वुफ़ क्या है? सद्चरित्र और ईश्वर का बोध।

वही सब तसव्वुफ़ है और उससे अधिक कुछ नहीं।
तसव्वुफ़ क्या है? प्यार और स्नेह।

यह नफ़रत और प्रतिशोध की भावना को मिटाता है और उससे अधिक कुछ नहीं।
तसव्वुफ़ क्या है? दिल को छू लेने वाली शांति।

जो धर्म का मूल है और इससे अधिक कुछ नहीं।
तसव्वुफ़ क्या है? आपके मन की एकाग्रता।

जो अहमद का धर्म है और उससे अधिक कुछ नहीं।
तसव्वुफ़ क्या है? दैवी सिंहासन तक पहुंचने के लिए ध्यान-मनन।

यह दृष्टि की परिधि से काफी दूर है इससे अधिक कुछ नहीं।
तसव्वुफ़ व्यक्ति की कल्पना और अनुमान से दूर है।

तसव्वुफ़ निश्चितता में पाया जाता है और इससे अधिक कुछ नहीं।
धर्म की अलंघनीयता के अनुरक्षण हेतु आत्म-समर्पण।

यही तसव्वुफ़ है और इससे अधिक कुछ नहीं।
तसव्वुफ़ विश्वास का मार्ग और एकता का समर्थक है।

यही अविकृत धर्म है और इससे अधिक कुछ नहीं।
तसव्वुफ़ सहज और प्रबुध्द मार्ग है।

यह अत्यंत उदात्त आनन्दधाम है और इससे अधिक कुछ नहीं।
भारत अपने सूफी-संतों की दीर्घ और अत्यंत सम्मानित परम्परा के लिए प्रसिध्द है। उनमें अजमेर के सूफी संत हज़रत ख्वाज़ा मोईनुद्दीन चिश्ती है (जो ख्वाज़ा गरीब नवाज़ के रूप में प्रसिध्द हैं)। श्री लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा ”मेरा देश मेरा जीवन’ से कुछ अंश नीचे दिए गए हैं।

मैं यहाँ दोहराना चाहूँगा कि मैं इस तथ्य को मानता हूँ और उसपर गर्व महसूस करता हूँ कि भारत बहु-धर्मवाला देश है, जिसमें हमारा संविधान तथा सदियों पुरानी संस्कृति धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करती। मुसलमानों तथा ईसाइयों को अन्य लोगों की तरह समान अधिकार, उत्तरदायित्व तथा अवसर हैं। मैं राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न पक्षों को समृध्द बनाने में उनके द्वारा दिए गए महत्त्वपूर्ण योगदान की प्रशंसा करता हूँ। मैं सभी धर्मों का आदर करता हूँ। मैं यहाँ एक उदाहरण देना चाहूँगा। मैं वर्ष 2006 में भारत सुरक्षा यात्रा के दौरान राजस्थान, अजमेर, गया था। मेरी पार्टी के सहयोगियों ने सलाह दी कि मुझे पवित्र हिंदू तीर्थ पुष्कर अवश्य जाना चाहिए। इसके बारे में माना जाता है कि पुष्कर में स्वयं ब्रह्माजी ने झील का सृजन किया था। मैंने झट से ‘हाँ’ कह दी। लेकिन मैंने उन्हें कहा कि मैं अजमेर में पूजनीय सूफी संत हजरत ख्वाज़ा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह शरीफ़* पर भी जाऊँगा। यद्यपि उनमें से कुछ की भौंहें तन गई थीं, लेकिन मैं दोनों तीर्थस्थलों पर गया।

‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की अवधारणा में भारत के विभिन्न धर्म अनुयायियों को यह आदेश दिया गया है कि विविधताओं को कायम रखते हुए प्राचीन देश की साझा संस्कृति का आदर करो, गर्व महसूस करो। अन्य राष्ट्र के प्रति निष्ठा न रखी जाए, न ही अन्य धर्मों को झूठा या हीन समझें, बल्कि यह सीखें कि प्रत्येक धर्म की अपनी विशेषताएँ हैं। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का अर्थ इससे न ज्यादा है, न इससे कम।

*वर्ष 2000 में अजमेर दरगाह पर मेरी तीर्थयात्रा के बारे में रिपोर्ट दी गई है’गृहमंत्री एल.के. आडवाणी ने रविवार को हजरत ख्वाज़ा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर प्रार्थना की। स्थानीय मुसलमान इतने भावातिरेक में थे कि उन्हें देखने के लिए बहुत बड़ी भीड़ दरगाह में एकत्र हो गई। भीड़ ने बार-बार अनुरोध किया था कि थोड़ा सा कुछ कहें। आडवाणी मान गए और उन्होंने कहा, ‘भारत एक बहु-धर्मवाला देश है तथा सभी धर्मों के लोग अच्छे इंसान बनने की कोशिश करते हैं। इसीलिए प्रत्येक समुदाय इस दरगाह पर आता है। पहले हम नेक इनसान बनें। इसका कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका आराध्य ईश्वर है या अल्लाह है।’ उन्होंने कहा कि ‘हालाँकि बीसवीं शताब्दी पश्चिमी जगत् की रही, लेकिन यदि सभी समुदाय एकजुट होकर मिलकर कार्य करेंगे तो निश्चित रूप से इक्कीसवीं शताब्दी भारत की होगी।’ इस पर भीड़ ने जवाब दिया, ‘आमीन!’ (आश्चर्य! आडवाणी ने अजमेर दरगाह पर प्रार्थना की, द टाइम्स ऑफ इंडिया, 4 दिसंबर, 2000)। बाद में जब एक पत्रकार ने मुझसे पूछा कि क्या दरगाह में मेरी यात्रा अपनी छवि को बदलने का प्रयास है, तो मैंने जवाब दिया, ‘मेरा दृष्टिकोण हमेशा स्पष्ट रहा है। मैंने पच्चीस वर्ष पहले जो कहा था, आज भी, अब भी मैं वही सब कह रहा हूँ।’

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